Wednesday, 19 September 2018

पानी पुनर्जीवन मे लगे विशाख जी !

जो समाज जल बूँद से प्रेम करेगा
वह पानीदार बनेगा।
यह बात चित्रकूट के
युवा जिलाधिकारी विशाख जी अय्यर सूखी
मन्दाकिनी नदी समाज को समझा
रहे है।
इस समझ के साथ सूखी मन्दाकिनी नदी
समाज के बीच उन्होने  लोगो को सूखी
नदी मे खुदाई करा कर  प्रेरित किया।
जिला प्रशासन की ओर से
मई 2018 से मन्दाकिनी नदी पुनर्जीवन अभियान
शुरू किया गया था।

आज वह मन्दाकिनी नदी ही नही
जनपद के सभी सूखे मृत जल श्रोतों के
पुनर्जीवन मे लगे है।
बुन्देलखण्ड मे पानी दार गांव कौन है ?
कैसे बनता है कोई गांव पानीदार ?
सरकार के धन से या समाजिक
पुरुषार्थ की अगुवाई से !
तब चित्रकूट मंडल के
के उन गांवो को देखना होगा कि जिन्हे सरकार
ने कोई धन नही दिया और वह पानी दार
बन गये !
चित्रकूट जनपद की अच्छी नदिया इसलिए सूख गयी
कि उनमे केवल सरकारी अगुवाई से पानी संरक्षण के काम
चेक डैम बना कर किए गये ।
चित्रकूट जनपद की मन्दाकिनी और सिघाश्रोत नदी का समाज कहता है कि हमारी नदी को चेकडेम ने
सुखाया और पेड़ो की कटाई ने।
सरकारी प्रयासों से सूखी जलधाराओ को समाज ने
मिलकर कैसे पुनर्जीवित किया इसका उदाहरण
बांदा जनपद मे जखनी गांव और चित्रकूट मे
बरगढ के कुछ गांव है जिनमे पानी की
कहानी समाज ने रची !
भारत सरकार के ग्राउड वाटर बोर्ड द्वारा
चित्रकूट मे जल पर एक कार्यशाला दिनांक
19 सितम्बर 2018 को आयोजित की।
कार्यशाला का विषय था--
सहभागिता द्वारा जल मृत प्रबन्धन
एव स्थानीय भूजल विषय पर प्रशिक्षण!
इस कार्यशाला मे ऐसी सफल कहानी भी सुनने को मिली
जिसमे सामाजिक अगुवाई ने अपने गांव मे बरसात
की बूँद को बडे प्यार से रोका उसे न दौडने दिया न
चलने दिया बल्कि रेगा कर सीधे तालाब मे डाल दिया।
यह कहानी जखनी और बरगढ की थी।
पानी को भी प्यार सम्मान चाहिए।
समाजिक सहभागिता की सफल कहानी से
मिली जानकारीया
बडी सार्थक और प्रेरणा प्रद रही ।
बरगढ की कहानी मे सिघाश्रोत नदी पुनर्जीवन
और समाज द्वारा बनाए तालाब है।
कहानी के दिलचस्प पहलू यह थे कि-
चित्रकूट के बरगढ क्षेत्र की गुइया गांव की नदी
सिघाश्रोत जब 2011 मे सूखी
तब अपनी मरी नदी को जीवित करने मे
गांव की 5 माताओ की नदी पुनर्जीवन पहल कहानी
ने दिल छू लिया।
2011 मे चित्रकूट मे पानी का हाहाकार मचा था
यहाँ  के वर्तमान जिलाधिकारी पशुवो का तथा
समाज का जीवन कैसे बचे इस पर परेशान थे।
बरगढ मे उन्हे आशा की किरण दिखी और दौड़कर
वह पूर्व आई ए एस कमल टावररी जी के साथ
सीधे बरगढ पहुंचे और सिघाश्रोत नदी गये।
सच यह था कि जिलाधिकारी जी
महिलाओं के पुरुषार्थ को देखने नही गये बल्कि जिले के सूखे जल श्रोतो मे पानी कैसे पैदा हो नदी कैसे बहे इस ग्यान को
लेने गये।
सिघाश्रोत नदी पुनर्जीवन को देखा सीखा !
नदी से लौट कर  तुरंत आदेश किये कि
सूखी नदियो मे खुदाई करा कर
पानी खोजा जाय ?
जखनी गांव की कहानी मे समाज
ने बरसात के पानी का प्रबन्धन समाजिक बल से किया
और वह वहां का समाज पानी का बंटवारा बडे
सहभागी ढंग से करता है। सरकार का इसमे एक
भी योगदान नही है ।गांव मे जबरदस्त जातीय धार्मिक
समरसता है!
गांव मे जल स्वालंबन दिखता है ??
जखनी और बरगढ के समाज ने
यह सिद्ध कर दिया  कि समाज जब
अपने पुरुषार्थ से कोई संकल्प लेता है और उसे
पूजा की तरह करता है वह परिणाम रोशनी
देने वाले होते है ।
चित्रकूट के वर्तमान युवा जिलाधिकारी श्री विशाख जी
दिल से पानी दार है--'
सच मे वह पानी से प्रेम करते है ।
जनपद मे आते ही मन्दाकिनी पुनर्जीवन
पर समाज की अगुवाई देखी तो वह भी
सूखी मन्दाकिनी नदी को जीवित करने मे लग
गये।तब पंचायत भी लगी और सरकारी लोग
की प्रथभिकता बनी ।धीरे धीरे जनप्रतिनिधि भी
लगे !
परिणाम यह रहा कि सूखी मन्दाकिनी गावो मे
बहने लगी !
पानी आने से गांव मे पानी के
अभाव मे मरने वाले पशुवो  को जीवन मिला।
गांव की महिलाओं को राहत मिली क्यों कि
पानी सबसे महिलाऐं खोजती है ढोती
है।परिवार मे शांति लाने के लिए वह 24 घंटे
अशांत रहती है ।बच्चे पढ़ाई छोडकर केवल
मा के साथ पानी ही ढ़ोते है।
महात्मा गाँधी विश्व विद्यालय की पर्यावरण विषय
मे डीन शु श्री साधना चौरसिया ने बताया कि
मंदाकिनी नदी कैसे सूखी ?
सरकारी चेकडैम नदी क्यो सूखा देते है --
जब कि भारीभरकम बजट खर्च होता है --
सिघाश्रोत तथा मन्दाकिनी नदी के समाज
ने बडे खुले शब्दो मे कहा
ने हमारी नदी सूखने कि एक बडा कारण सरकारी
चेकडेम भी है !!@
जिलाधिकारी श्री विशाख जी  ने जिले मे आकर
इस पर ध्यान दिया।कल उन्होंने बताया कि वर्ष 018-019
मे चेकडेम प्रस्ताओ पर बडी चौकसी से निरीक्षण कराया।
नये चेकडैम कैसे लाभ प्रद हो? इस नजरिए से
नये प्रस्ताव देखे गये ।
उन्होंने बताया कि -
चित्रकूट जनपद मे इस वर्ष  करीब
56 चेक डैम के प्रस्ताव आए।
प्रस्ताव परिक्षण मे यह देखा गया कि वह क्या
पानी संरक्षण कर सकते है?
परिक्षण मे पाया गया कि --केवल 15 चेकडेम
के प्रस्ताव ऐसे मिले जो वाजिब थे ।
सोचिए
कि हमारे बीच एक ऐसा समाज भी है
जिसने सरकारी चेक डैम के बिना अपने
गांव मे पानी का संरक्षण किया !
सच मे यदि सरकार ऐसे लोगो के साथ जुड़
कर काम करे तो कम धन मे समाज
पानी दार बन जायगा !!
समाजिक अगुवाई यदि सीखना है तो
तो  इसके लिए पानी दार गांव जैसे बरगढ
के आजाद पूर्वा सेमरा
लसही चलना होगा या भाई उमा शंकर के
जखनी गांव जाना होगा ।
जहां गांव की सहभागिता से गाँव के चुनींदा
लोगो के द्वारा
बरसात की एक एक बूँद का सम्मान किया गया
उसके साथ प्रेम किया गया ।
बरगढ  के समाज ने
अपने पुरुषार्थ से करीब
15 तालाब तब बनाए जब फ्रांस के एक
युवा ने पानी से तडपते समाज के बीच
बरसात की एक बूँद के
महत्व को बताने के लिए --गांव गांव मे
राते बिताई -हिंदी सीखा और पानी गांव मे
कैसे रुकें इस पर गांव के पुराने ग्यान की पहचान
गांव वालों से ही बनवाई ।चित्रकूट की 42 डिग्री
की गरमी को सहा।
तब गांव मे पुरुषार्थ जगा और लोग अपने खेत मे
तालाब बनाने के लिए श्रमदान करने लगे।
2013 से लेकर 2015 तक बरगढ के पानी दार
किसानो ने अपनी भूमि मे अपने श्रमदान के
लिए तालाब खोदने लगे ।
बाद मे उनकी गरीबी को देखते हुवे अर्थिक मदद्
ईश्वर ने दिलाई।
2018 की बरसात मे तालाबों मे पानी लबालब है ।
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून
बरसात की एक बूँद  कैसे
मोती की तरह सुरक्षित करे और फिर उसका उपयोग भी मोती की तरह हो ।
तब समाज मे समृद्धि
देखेगी और समाज पानीदार बनेगा।
समाज न चेक डैम से पानीदार होगा न ही
बडे बाँध से होगा!
समाज जब जल की बूँद से प्रेम करेगा तब
पानीदार होगा।
अभिमन्यु भाई

Wednesday, 12 September 2018

गंगा के लिये तड़पता ऋषि वैज्ञानिक


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Submitted by editorial on Mon, 09/10/2018 - 18:34
स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के अनशन का 81वाँ दिन

स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदस्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदमानवीय प्रयासों द्वारा धरती में अवतरित एकमात्र नदी गंगा को वर्तमान पीढ़ी भविष्य के लिये नहीं छोड़ना चाहती। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी भारतीय सभ्यता, समाज और राज पर कोई गहरा संकट आता था तो ऋषि मुनि, तपस्वी और राज ऋषि समाज और राज को सही रास्ता दिखाते थे जिससे आने वाले संकट से बचा जाता था।

वर्तमान में गंगा जी भी अति संकटपूर्ण स्थिति से गुजर रही हैं। सिर्फ बरसात के तीन महीनों में गंगा जी की अवस्था कुछ ठीक रहती है और बाकी के 9 महीने तो लगभग वो मृतप्राय ही होती हैं। गंगा जी कि यह स्थिति कैसे हुई यह एक अतिमहत्त्वपूर्ण विषय है लेकिन इस पर सरकार का बिल्कुल भी ध्यान नहीं है। यही वजह है कि गंगा जी की सभी बीमारियों की जानकारी उनके निदान की समझ रखने वाले स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द (पूर्व प्रो. जी.डी.अग्रवाल) जी को बार-बार तपस्या (आमरण अनशन) करना पड़ रहा है। हमारी सरकारों को या तो गंगा जी कि विशिष्टता की समग्र समझ ही नहीं है या फिर जान-बूझकर समझने की कोशिश नहीं की जा रही है।

प्रो.अग्रवाल कहते हैं, “गंगा एक सामान्य नदी नहीं है, यह मानव प्रयास (राजा भागीरथ) द्वारा पृथ्वी पर लाई गई एक विशेष धारा है। इसके विशेष गुणों की समझ सभी धर्म के लोगों में थी। मुगल शासक अकबर तो नित्य गंगाजल का सेवन ही करता था, औरंगजेब भी गंगाजल को स्वास्थवर्धक मानता था।”

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान गंगा नहर निर्माण के समय गंगाजल की विशिष्टता को अक्षुण रखने की माँग पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने उठाया था जिसके बाद हरकी पैड़ी में गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने हेतु 1916 में हरिद्वार में एक बैठक का आयोजन किया गया था।

इस बैठक में 32 गैर सरकारी एवं 18 सरकारी प्रतिनिधि शामिल हुए थे। बैठक में शामिल हुए लोगों में 8 राज्यों के महाराजा भी थे जिनमें से 2 महाराजा दक्षिण से थे। कहने का निहितार्थ यह है कि उस समय भी सिर्फ गंगा बेसिन का मामला नहीं था बल्कि यह सांस्कृतिक धरोहर, एक पवित्रधारा, गंगाजल के स्वास्थ्यप्रद गुणों और रोगनाशक क्षमता का मामला था।

गंगाजल स्वास्थ्यप्रद गुणों की बात केवल एक कोरी मान्यता नहीं है इसे वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा भी सिद्ध किया जा चुका है। हम सभी ने यह अनुभव जरूर किया होगा कि गंगाजल को वर्षों तक रखने पर भी सड़ता नहीं है जबकि किसी अन्य नदी के जल के मामले में ऐसा नहीं है।

गंगाजल की इस विशेषता को समझने के लिये 1974-75 में आईआईटी कानपुर में प्रो. अग्रवाल के मार्गदर्शन में एमटेक के छात्र काशी प्रसाद ने शोध किया। शोध में पाया गया कि बिठूर (कानपुर के पास) से एकत्र किये गए गंगाजल में जब कोलीफार्म मिलाया गया तो कुछ दिनों में उसका 98 प्रतिशत हिस्सा स्वतः नष्ट हो गया।

कोलीफार्म मिलाए गए जल को जब फिल्टर किया गया तो उसमें केवल 45 प्रतिशत ही कोलीफार्म नष्ट हुए। उसी जल का जब पूर्ण शोधन किया गया तो कोलीफार्म की मात्रा में कोई बदलाव नहीं हुआ यानि कि एक भी कोलीफार्म खत्म नहीं हुआ। इसके बाद बिठूर से लिये गए जल को जब प्रयोगशाला में सेन्ट्रीफ्यूज (centrifuge) किया गया तो जल की कोलीफार्म नष्ट करने की क्षमता खत्म हो गई। इस प्रयोग से यह स्पष्ट हुआ कि गंगाजल में निलम्बित कण ही इस गुण के वाहक हैं।

इसी प्रकार से आईआईटी कानपुर में ही डीएस भार्गव द्वारा किये गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि गंगाजल में अवजल के शोधन करने की क्षमता सामान्य नदी जल से अधिक है। सामान्य नदी जल में बीओडी नष्ट करने (BOD Removal) की दर 0.01 से 0.02 थी जबकि गंगा में यह दर 0.17 है यानि की अन्य नदियों की तुलना में 8-17 गुना अधिक।

इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी चण्डीगढ़ ने अपने अध्ययन में गंगा जी में पाये जाने वाले फाजेज की मैपिंग करते हुए पाया कि इनमें 17 प्रकार के रोगाणुओं (जैसे बिब्रिथो कालरा, टायफाइड, सल्मोनेला आदि) को मारने/नष्ट करने की क्षमता है।

जिस समय टिहरी बाँध बन रहा था उस समय यह बात उठी थी कि टिहरी बाँध के कारण गंगाजल की विशिष्टताओं पर कोई प्रभाव तो नहीं पड़ेगा। इस बात को जानने के लिये बाँध का निर्माण करने वाली टीएचडीसी कम्पनी ने अध्ययन की जिम्मेदारी राष्ट्रीय पर्यावरण आभियांत्रिकी शोध संस्थान (नीरी) नागपुर को दी। नीरी ने अपने अध्ययन में पाया कि गंगा में कई भारी धातु और रेडियोएक्टिव पदार्थ सूक्ष्म मात्रा में विद्यमान हैं। इसमें विशेष बैक्टीरियोफाजेज भी है। और ये सभी विशेष गुण गंगा में पाये जाने वाले निलम्बित कणों (बहकर आने वाले मिट्टी के कणों) में विद्यमान हैं।

नीरी ने ही अपने अध्ययन में यह स्पष्ट किया कि 90 प्रतिशत निलम्बित कण टिहरी बाँध में जमा हो जाएँगे। यानि टिहरी बाँध बनने के बाद गंगाजल के 90 प्रतिशत विशिष्ट गुण समाप्त हो जाएँगे। परन्तु जैसा वर्तमान में पर्यावरणीय अध्ययनों में होता है।

नीरी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अलकनन्दा और मंदाकिनी नदियों के जल में भी यह विशिष्टताएँ विद्यमान हैं इसीलिये देवप्रयाग में ये गुण पुनः विद्यमान हो जाएँगे। परन्तु अब तो श्रीनगर में भी अलकनन्दा के प्रवाह क्षेत्र में बाँध बन गया है यानि की अलकनन्दा और मंदाकिनी के जो विशिष्ट गुण थे वह भी श्रीनगर बाँध की झील में समाप्त हो गए। इससे साफ़ है कि भागीरथी के प्रवाह क्षेत्र में टिहरी बाँध और अलकनन्दा के प्रवाह क्षेत्र में श्रीनगर बाँध के बन जाने के बाद गंगाजल की उस क्षमता का ह्रास हो गया जिसके कारण गंगा को पाप और रोगों का नाश करने वाली विलक्षण धारा माना जाता था।

जैसाकि आप सभी को पता ही होगा कि हरिद्वार से गंगाजल का लगभग 90 प्रतिशत भाग गंगनहर में डाल दिया जाता है जिससे उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली में सिंचाई एवं पेयजल की आपूर्ति की जाती है। गंगा की अपनी धारा में बहुत ही कम पानी रह जाता है और फिर हरिद्वार के मलजल शोधन संयंत्र (जगजीतपुर, कनखल) से शोधित-अशोधित मल-जल को गंगा में डाल दिया जाता है जहाँ से एक नई मलिन गंगा का बहाव नीचे की तरफ होता है।

उसके बाद गंगा में कई छोटी-बड़ी नदियाँ और धाराएँ मिलती हैं जिनमें भी अधिकांशतः या तो नगरों और कस्बों का अपमल होता है या फिर उद्योगों का अवजल। फिर उत्तर प्रदेश के नरोरा में बैराज बनाकर गंगा को नहर में पुनः डाल दिया जाता है। प्रयाग (इलाहाबाद) एवं वाराणसी में जो लाखों लोग प्रतिदिन स्नान करते हैं वह नगरों के अपमल एवं उद्योगों द्वारा गंगा में विसर्जित अवजल है क्योंकि गंगोत्री,बद्रीनाथ एवं केदारनाथ से आने वाले गंगाजल की मात्रा तो शायद ही वहाँ तक पहुँच पाती है।

अगले वर्ष 2019 में प्रयाग में पड़ने वाले महाकुम्भ की तैयारियाँ बड़े जोर-शोर से चल रही हैं जिसमें करोड़ों श्रद्धालुओं के साथ साधु-सन्त, महामण्डलेश्वर, शंकराचार्य सभी वहाँ एकत्रित होकर गंगा स्नान का पुण्य लाभ अर्जित करेंगे। तैयारी यही होगी कि मुख्य स्नान दिवसों पर टिहरी बाँध से पानी छोड़ा जाएगा। परन्तु एक बड़ा सवाल है कि छोड़े गए पानी का कितना भाग हरिद्वार एवं नरोरा कैनाल से होते हुए प्रयाग पहुँचेगा? कितना अवजल या मलिन जल उसमें मिला होगा? या फिर पिछले कुम्भ की भाँति शारदा नहर का भी सहारा लिया जाएगा।

यह मान भी लिया जाये कि टिहरी से छोड़ा गया कुछ जल प्रयाग पहुँच भी गया तो क्या उसमें गंगाजल का वह अद्वितीय गुण-धर्म होगा जिसके लिये वह जानी जाती है? ऐसा शायद ही हो क्योंकि अद्वितीय गुण-धर्म वाले कण तो टिहरी झील की तलहटी में समा गए हैं। तो क्या यह उन करोड़ों लोगों की आस्था के साथ छलावा नहीं होगा जो लम्बी-लम्बी यात्राएँ करके गंगा में डुबकी लगाने के लिये आते हैं? क्या उनके द्वारा श्रद्धा से अपने घर ले जाया गया जल स्वच्छ और निर्मल होगा जिसके लिये गंगा जानी जाती है।

भारत सरकार द्वारा संचालित स्वच्छ गंगा मिशन ‘नमामि गंगे’ में प्रमुख जोर मल-जल शोधन संयंत्रों (STPS) को बनाने पर है जबकि 1986 में भारतीय सरकार द्वारा चलाए गए गंगा एक्शन प्लान (GAP) की विफलताएँ सभी के सामने हैं। गंगा की सफाई बिना उसकी अविरलता की पुनर्बहाली के नहीं हो सकती है लेकिन लगता है सरकार इससे कोई सरोकार नहीं रखती। तभी तो गंगा और उसकी सहायक नदियों पर बाँधों की स्वीकृति वाटरवेज का निर्माण की पहल की जा रही है।

प्रो. जी.डी. अग्रवाल जी को देश का पहला पर्यावरण वैज्ञानिक माना जा सकता है आईआईटी कानपुर में पहली बार इन्होंने ही पर्यावरण अभियांत्रिकी पढ़ाना शुरु किया था। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के प्रथम सदस्य सचिव रहते हुए प्रदूषण नियंत्रण हेतु कानून/नियम बनाने, मानको के निर्धारणों, मापन तकनीकों के विकास में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। यहाँ तक कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के संरचना के विकास में भी इन्होंने अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है।

लम्बे समय के बाद 2007 में जब प्रो. अग्रवाल का हिमालय की गंगा घाटी में जाना हुआ तो गंगा जी की दुर्दशा (विशेषकर बाँधों/जल विद्युत केन्द्रों) को देखकर उनका मन व्यथित हो उठा और उन्होंने गंगा जी की दशा ठीक करने हेतु अपने स्तर पर प्रयास करने शुरू कर दिये। परन्तु एक वर्ष तक विभिन्न स्तरों पर किये गए प्रयासों के बाद उन्हें महसूस हुआ कि न ही समाज, न सरकारें और न ही साधु-सन्त गंगा जी की दशा को लेकर गम्भीर हैं। इसके बाद उन्होंने जून 2008 में आमरण अनशन इसलिये प्रारम्भ किया कि आने वाली पीढ़ी कम-से-कम 100 किमी गंगोत्री से उत्तरकाशी तक गंगा जी को अपने नैसर्गिक रूप में देख सके।

मनेरी भाली प्रथम (उत्तरकाशी से 13 किमी ऊपर) से गंगा सागर तक गंगा कहीं भी अपने नैसर्गिक रूप में नहीं बची है। उनके लगातार (3 बार) आमरण अनशनरूपी तपस्या का प्रतिफल रहा कि उत्तरकाशी से गंगोत्री के बीच प्रस्तावित एवं निर्माणाधीन तीन परियोजनाओं पाला-मनेरी, भैरवघाटी एवं लोहारीनाग पाला को तत्कालीन राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार ने निरस्त कर दिया।

केन्द्र सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया। नेशनल रिवर गंगा बेसिन आथरिटी (NGRBA) का गठन किया गया साथ ही उत्तरकाशी से गंगोत्री तक के इलाके को इको सेंसिटिव जोन घोषित किया गया। यहाँ तक कि देश में नदियों में पर्यावरणीय प्रवाह को लेकर जो सोच शुरू हुई यह डॉ. अग्रवाल जी की तपस्या का ही प्रतिफल है।

जब अलकनन्दा में श्रीनगर एवं विष्णुगाड़ पीपलकोटि तथा मंदाकिनी में फाटाव्योंग एवं सिंगोली-भटवारी जैसी परियोजनाएँ बनने लगीं तब उनका मानना था कि नीरी की रिपोर्ट में जो बात कही गई थी कि मंदाकिनी और अलकनन्दा में भी विशेष गुण है, अब तो वह भी श्रीनगर बाँध की झील में समा जाएँगे। गंगा के साथ हो रहे इस तरह के बर्ताव ने हमेशा उनके मन को बेचैन किया जिससे उन्हें बार-बार आमरण अनशन करना पड़ा।

प्रो. जी.डी. अग्रवाल जी का यह मानना था कि देश के साधु-संत तथा धर्माचार्य ही गंगा की दशा सुधारने हेतु सरकारों को नियंत्रित एवं क्रियाशील रख सकते हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानन्द जी के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी से सन्यास की दीक्षा लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द का नाम धारण किया। इसके पीछे का मूल उद्देश्य यह था कि शंकराचार्यों, महामण्डलेश्वरों एवं साधु-सन्तों के बीच रहकर उन्हें गंगा संरक्षण हेतु प्रेरित करें और उन्हें इसके लिये सही रास्ता दिखा सकें।

2013 में स्वामी सानन्द जी के आमरण अनशन के दौरान जब उन्हें दून अस्पताल में रखा गया था तब पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी ने वृंदावन बुलाकर उनका उपवास समाप्त करवाया। साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि मोदी जी जब प्रधानमंत्री बन जाएँगे तब जो आपकी सोच गंगा के प्रति है जो आप चाहते हैं हम सभी पूर्ण कराएँगे। यहाँ तक कि कई राजनीतिक एवं प्रभावशाली व्यक्तियों ने जो गंगा के प्रति श्रद्धा भी रखते हैं तथा बीजेपी से भी जुड़े हैं, स्वामी सानन्द को आश्वासन दिया था कि बीजेपी की सरकार बनते ही आपकी माँगों को पूर्ण कराया जाएगा।

जब 2014 में चुनाव के समय वाराणसी में मोदी जी ने कहा कि मुझे माँ गंगा ने बुलाया है तो उनकी आशा बढ़ी कि मोदी जी गंगा संरक्षण हेतु प्रभावी कदम उठाएँगे। जब मोदी जी ने नया गंगा मंत्रालय बनाकर उसका प्रभार उमा भारती जी को दिया तब सानन्द जी की और भी आशाएँ बढ़ीं। परन्तु चार वर्ष बीत जाने के बावजूद भी गंगा की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो स्वामी सानन्द उन सभी लोगों से मिले जिन्होंने गंगा को संरक्षित करने का उन्हें आश्वासन दिया था। उनसे मिलने के बाद स्वामी सानंद को यह पता चला कि आकाओं ने तो गंगा के संरक्षण के लिये कोई काम ही नहीं किया।

इससे स्वामी सानंद को घोर निराशा हुई और वे गंगा दशहरा 22 जून 2018 से आमरण अनशन रूपी तपस्या पर हैं। स्वामी जी जानते हैं कि जब तक गंगा के संरक्षण हेतु कड़े कानून नहीं बनेंगे तब तक उनकी दशा सुधर नहीं सकती है। उनका मानना है कि जो लोग गंगा को एक सामान्य नदी की तरह देखते हैं वे उनका संरक्षण नहीं कर सकते। गंगा को पवित्र धारा समझने वाले गंगा भक्त ही उनकी दशा को ठीक कर सकते हैं। इन्हीं बातों की ध्यान में रखते हुए उन्होंने इन चार माँगों को सरकार के समक्ष रखा है।

1. गंगा के लिये प्रस्तावित अधिनियम ड्राफ्ट 2012 पर तुरन्त संसद द्वारा चर्चा कराकर पास कराना (इस ड्राफ्ट के प्रस्तावकों में स्वामी सानन्द, एम.सी.मेहता और इ.परितोष त्यागी शामिल थे)। ऐसा न हो सकने पर उस ड्राफ्ट की धारा 1 से धारा 9 को अध्यादेश द्वारा तुरन्त लागू और प्रभावी कराया जाये।

2. अलकनन्दा, धौलीगंगा, नन्दाकिनी, पिण्डर तथा मन्दाकिनी पर सभी निर्माणाधिन/प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं को तुरन्त निरस्त करना।

3. प्रस्तावित अधिनियम की धारा 4 (D) वन कटान तथा 4 (F) व 4 (G) किसी भी प्रकार की गंगा में खुदान पर पूर्ण रोक तुरन्त लागू कराना विशेषतया हरिद्वार क्षेत्र में।

4. गंगा-भक्त परिषद का गठन, जो गंगा और केवल गंगा के हित में काम करने की शपथ गंगा में खड़े होकर लें।

स्वामी सानन्द की तपस्या अनशन प्रारम्भ होने के बाद उमा भारती, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री भारत सरकार तथा नितिन गडकरी सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री, नौवहन एवं जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्री भारत सरकार के पत्र आये, जिनमें माँगों को लेकर कोई बात नहीं थी। उमा भारती अनशनरत स्वामी सानन्द जी से मिलने मातृसदन हरिद्वार भी आईं। इन सबसे ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार कुछ करना ही नहीं चाहती।

सरकार इस दम्भ में भी है कि वह जो कर रही है वही सही है। नमामि गंगे जैसी परियोजनाओं से गंगा का कोई भला नहीं होने वाला है। सरकार की यह दोहरी मानसिकता समझ से परे है एक तरफ गंगा में बाँधों की शृंखला खड़ी की जा रही है और जलमार्ग बनाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ नमामि गंगे जैसी असफल योजनाओं का ढोल पीटा जा रहा है।

खैर, स्वामी सानन्द जी 81 दिनों से अन्न फल त्याग कर सिर्फ जल के सहारे तपस्या में हैं यह गंगा माँ की कृपा ही है कि 86 वर्ष के होते हुए वे आज भी निराश एवं दुखी रूप में हमारे बीच हैं। इसी बीच में एम्स ऋषिकेश को अपनी देह दान करने हेतु कानूनी प्रक्रिया भी पूर्ण कर चुके हैं।

सरकार और समाज दोनों की आत्मा तो मर ही चुकी है। साधु-सन्त भी विलासिता के चक्कर में गंगा को भुलाकर अपनी आत्मा को मार चुके हैं। गंगा की यह दुर्दशा और ऋषि वैज्ञानिक स्वामी सानन्द की तपस्या व्यर्थ नहीं जाएगी। सरकारों, समाज एवं साधु सन्तों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। गलती सुधारने का अभी भी मौका है आगे शायद मौके भी न मिलें।



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Monday, 10 September 2018

मन्दाकिनी नदी पुनर्जीवन यात्रा

चित्रकूट की सूखी मन्दाकिनी नदी
समाज के पुरुषार्थ से बही।
समाज से प्रार्थना  है कि-
तेरा तुझको अर्पित क्या लागे मेरा।
सांसो की माला मे 'बहता तेरा नाम --
समाज की माला समाज को अर्पित ---
पंच महाभूत ही तो परमेश्वर का स्वरूप है इनकी रक्षा
और संरक्षण लिए लिए कोई भी निस्वार्थ रूप से
अंश भर लग जाय तो वह माला पहना देता है --'
सच हमने कोई बडा काम नही किया काम
तो जल भागीरथीयो  और जिले के जिलाधिकारी और उनकी टीम ने किया !!!!
चित्रकूट जनपद की मीडिया को भी समर्पित है जिन्होंने
नदी पुनर्जीवन विचार को समझा  और निस्वार्थ
समाज मे बोया ।चित्रकूट के वह सभी जनप्रतिनिधि राजनैतिक दलो के प्रतिनिधि को भी समर्पित है-
जिन्होने  इस विचार को स्वीकार कि माता मंदाकिनी नदी पुनर्जीवन जरूरी है और नदी को पेय जल नदी के रूप मे मान्यता जरूरी है।
यह माला चित्रकूट के
जिलाधिकारी श्री विसाक जी को विशेष समर्पित जिन्होंने नदी पुनर्जीवन के काम मे लगी टीम की प्रगति को हर पर प्रोत्साहित किया और एक माह के अन्दर समाज
ने सूखी नदी बहने लगी।
यह माला सरकारी  टीम तथा ग्राम पंचायतो के प्रधानो तथा वहां के समाज -को भी समर्पित जिनके सबके प्रयास से सूखी नदी बहने लगी ।
हम उन सभी भागीरथीयो की वन्दना करते है जिन्होने   नदी को अपने श्रम से सहेजा उसके ऊपर की मिट्टी निकाली और जल धाराओ को प्रेम से अभिसिचित कर बहने के लिए  रास्ता बनाया ।
सुखे मरुस्थल मे जब जल धारा बहने लगी तब न जाने कितने जीवो ने अपनी प्यास बडी सहजता से बुझाई ।
न जाने कितने पशु पक्षी दूर दूर से आकर अपनी प्यास बुझा रहे थे ।इससे बडा परिणाम क्या हो सकता है।
सबसे राहत उन माताओ बहनो बेटियो को हुई जिनके परिवार की आजीविका केवल पशुओ पर है और उनके लिए प्रतिदिन सुबह से रात तक पानी खोजने का काम करना पडता था ।
आज उनके पशुओं को पर्याप्त पानी है।
यह माला उनको भी समर्पित है
जिन्होने नदी संवाद नदी श्रमदान नदी उपवास  मे दिल से सहभाग किया और वह भी
जिन्होने नदी शांति यात्रा मे दिल से भागीदारी दी।
वह तपती धरा मे तब तक चले जबतक गंतव्य नही मिला। वह सभी महानुभाव जैसे -आदित्य सुनील गर्ग , Vinay Kumar Singh Saurabh Dwivedi Chandra Prakash Khare Ramanand Prajapati Hemraj Kashyap  Jugnu Khan प्रधान मकरी शीतल जयसवाल तथा प्रधान सगवारा भटरी पनौटी तथा महुवा के साथ पूर्व ब्लाक प्रमुख  रूद्र देव सिह तथा सरधुवा के लाल बहादुर सिंह वैश्य  ने नदी संवाद नदी श्रमददान और नदी उपवास  मे बडी सहभागिता दी ।
भाई रामनरेश ,राम स्वरूप संत शिवबरण लाल प्रगय डाक्टर नागेन्द्र जी नदी शांति  यात्रा  मे चले और बीमार होने के बाद भी लगे रहे।
यह माला चित्रकूट के ख्यात प्राप्त बाल चिकित्सक  श्री
 Suresh Prasad Tripathi जी को समर्पित जिन्होने
मकरी जाकर नदी सत्संग मे सुना और अपनी बात ही नही रखी बल्कि शांति  सैनिको को फर्स्ट  एड बाक्स भी दिया कि यात्रा मे सैनिको  को कोई दिक्कत न हो ।
यह माला नदी समाज के महान लोगो को भी समर्पित जिन्होने यात्रीयो को प्रेम का भोजन दिया  और अपनी नदी के साथ संवाद कर नदी के साथ अपने खराब व्यवहार पर प्रायश्चित किया और अच्छे व्यवहार के लिए  संकल्प लिया ।
यह माला उन सभी महानुभाव  और संतो के लिए समर्पित है जो नदी पुनर्जीवन के लिए  इसे अविरल निर्मल बनाए रखने के लिए लगातार लगे है ।
हमारा सभी से विनम्र निवेदन है कि सभी नदी प्रेमी
अपने भेद भाव को समाप्त कर इस माला की तरह
एक हो कर नदी की आजादी के लिए और इसे अपने पुरुषार्थ से अविरल निर्मल बनाने के लिए
लग जाए और माला की तरह सुन्दर दिखे।
नदी पुनर्जीवन मे समाज के साथ दिल से लगे है यही प्रार्थना है।
अभिमन्यु भाई

स्वामी सानंद के साथ नदी संवाद

नदियां रहेगी तो जीवन रहेगा
जीवन रहेगा तो सरकारें रहेगी ???
तब स्वामी सानंद जी 80 दिनो से अविरल
केवल जल पर बैठै है --वजन घट गया और वह अब
यह कहने लगे है कि --इतने दिन तक और जीवन
चलेगा ?
गंगा पर मेरे मन के मुताबिक क़ानून नही बनता
तब तक मेरी तपस्या चलती रहेगी ।यह तपस्या
राम जी के लिए है ।मै खुश हू।
चित्रकूट मन्दाकिनी नदी शांति यात्रा के
शान्ति सैनिक डाक्टर नागेन्द्र आज हरिद्वार मे
स्वामी सानंद जी के साथ रहे उन्होंने आज
फोन से मेरी बात आदरणीय स्वामी जी से कराई।
डाक्टर नागेन्द्र जी और स्वामी जी के बीच
का संवाद बड़ा तेजस्वी और संवेदनशील रहा।
स्वामी सानंद जी ने कहा कि
राम जी की गंगा राम जी का मै ।
राम जी जैसा चाहेंगे वही होगा ।
पर राम जी गंगा को बचाने मे मेरे प्राण चले
तो जाने दूँगा।
जो कुछ करना है वह राम जी को करना।
बस आप लोग मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मै राम जी की गंगा के लिए काम आ सकू।
यह आमरण अनशन नही यह मेरी तपस्या है
अविरल गंगा के लिए ।
आने वाले दिनो मे पानी भी छोडूंगा।
डाक्टर नागेन्द्र जी ने बताया कि प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद  साहब से पहली बार मिला।
नदियो  जंगल आदि की जो जानकारी उनके पास है वह सरकार के इन्जीनियर वैज्ञानिक के पास भी नही होगी।वह बताते है कि अविरल गंगा कैसे हो?
सच मे  वह ग्यान के भण्डार है।हम जैसे आज के युवाओं को सही जानकारी देने वाला बहुत खोजने से मिलता है ।सरकार और समाज को चाहिए कि उनका जीवन बचाए।
अभिमन्यु भाई

Thursday, 6 July 2017

Can India make Natural power ???








भारत का इजराइल
बुन्देलखण्ड के
बरगढ मे कही झलकता है!
क्या बुन्देलखण्ड कभी
इजराइल की तरह पानी दार
बन सकता है ?
कल बरगढ के करीब 7 ग्राम पंचायतो का समाज बिना सरकारी मदद से अपने सामूहिक श्रम से खोदे गये करीब 17 तालाबो मे पहली बरसात के पानी से लबालब भरा देख खुश हो रहा था।
सभी के सभी नागरिक बच्चे अपने को पानीदार महसूस कर रहे थे और मै भाई नरेन्द्र मोदी जी के इजराइल मे दिये जा रहे भाषण से बहुत खुश था ।
एक ऐसा व्यक्ति हुवा जिसने 800 साल पहले भारत के सूफी संत बाबा फरीद की बात इजराइल मे जाकर कही ।
भारत इजराइल
तब गया जब भारत युवा हुवा ?
और यहां का आम युवा अकुशल है जिसे कुशल
बनाने मे भारत सरकार लगी है !
और इजराइल के युवा ही इजराइल की शान है ?
आत्मविश्वासी आत्म सम्मानित और दक्ष है !
इजराइल के युवा आपदा प्रबंधन मे माहिर है वह पहले काम कर लेते है सरकार बाद मे आती है और भारत का युवा आपदा मे केवल टोल फ्री नम्बर तथा नेते जी का मोबाइल नंबर ही जानता है और उसी केवल सहारे बैठा रहता और आपदा मे  तोड़ देता है ?
क्यो 70 वर्ष लगे भारत को इजराइल पहुँचने मे ?
भारत इजराइल से कई गुना बडा देश है जैसे जनसंख्या तथा क्षेत्रफल मे देखे तो इजराइल बहुत छोटा दिखेगा!सायद एक छोटे देश मे न जाना भी एक डिप्लोमेसी ही होगी ?
यह सब बाते राष्ट्र संचालन के मुद्दे की है जो मेरी समझ से परे है ?
लेकिन 70 साल बाद इजराइल जाना भारत की मजबूरी मुझे निम्न बातो मे दिखती है -
1- इजराइल कैसे बडे से बडे देश
    को धूल चटाता है ?
2- भारत के नागरिक तथा इजराइल
     के नागरिक मे अन्तर क्या है?
3- इजराइल की आपदा प्रबंधनकी तकनीक को
    जानना और सफलता की कुंजी खोजना।
सोचिए कि
बाबा फरीद के पास जो कुंजी थी उसे इजराइल ने एक तीर्थ की तरह स्तेमाल किया ।
किंतु भारत बाबा फरीद की बात आज तक नही समझ सका ?
यदि भारत सब कुछ जान भी गया तो क्या भारत का प्रत्येक नागरिक इजराइल नागरिक की तरह एक सम्मानित नागरिक दिख सकता है ? यदि हां तो कैसे ?यह प्रश्न मेरे दिमाग मे तब उत्पन्न है जब से मैने भाई नरेंद्र मोदी जी को इजराइल मे सुना ।उन्होने अपनी बातो को बखूबी रखा जिसमे सबसे अधिक उन बातो को रखा जिन बातो की नीव पूर्व प्रधानमंत्री स्व नरसिम्हा राव ने रखी थी वह थी -ग्लोबलाइजेशन की ?
इजराइल ने जल जंगल जमीन और जीवन को सम्मानित कर ही अपने को ताकत वर स्वावलंबी तथा स्वाभिमानी बनाया है ।एक एक बूंद वर्षा जल का सम्मान किया है और उससे जो उगा उसी से अपने को ताकतवर बनाया है ।
प्रधानमंत्री जी ने भारत के सभी विषयो पर बखूबी साहस के साथ अपनी बात रखी पर भूमि तथा रियल स्टेट के बीच के दर्दनाक स्थिति से निपटने के तरीको को नही बताया ।
भारत का जवान/युवा
बूढी मर रही नदियो के बीच कैसे जीवित रहेगा यह भी नही बताया ?
भारत की आवास नीति मे ईमानदारी कैसी आए तथा
इमारत संस्कृति कैसे
लुप्त होते भारतीय व्यंजन /बोली /भाषा को बचाएगी?यह भी नही बताया?
भारत की कितनी कृषि योग्य भूमि भारत के आवास रियल स्टेट और लेगे  इसकी भी कोई सीमा भारत के भूमि विकास /कृषि मंत्रालय के पास नही है ?
भारत की एक निर्धारित सीमा है तब जमीन /भूमि भी तो निर्धारित  है ? वह कैसे बढेगी ?
बुन्देलखण्ड की पंचायत मे कोई भी कहीं भी मकान बनाए और कितना बड़ा से बडा क्षेत्रफल ले कोई सीमा नही ।
जितना बडा नेता उसका उतना ही बड़ा मकान और संख्या कितनी भी हो ?
बरसात की बूंद
सीमेंट की सडको से कैसे धरती माता के पेट मे जायगी ?
यह तकनीक हमे इजराइल नही बता सकता ?क्योंकि उसने सीमेंट का स्तेमाल प्राकृतिक संतुलन के आधार पर किया है ।
सच मे मोदी जी के अल्प कार्यकाल मे बहुत बडी उपलब्धि रही कि FDI तथा GST को लागू हुई। पूर्व की सरकार ने शुरुआत तो थी किन्तु लागू नही करा सकी ।
मोदी जी ने पर्यावरण अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रक्रिया को सरल बनाया ।अब 6 माह के अन्दर प्रमाण मिल जायेगे। यानी खनिज दोहन वैधानिक रूप से चौगुना होगा ।
मनमोहन सिंह जी अहलूवालिया जी के सुधार तथा भाई मोदी जी की सुधार नीति मे बडे अन्तर जो दिखते है वह है -
1- मनमोहन सिंह जी अहलुवालिया
    जी नदी को वस्तु कहते थे और
    भाई मोदी जी माता कहते है ।
2- उनकी नीतिया भ्रष्टाचार के कारण
    तथा अति लोकतांत्रिक होने के कारण
     अमल मे नही आती थी पर मोदी
     जी के व्यक्तिगत ईमानदार होने
     तथा वह समय पर दिख रही
     है।
क्या भारत सच मे
इजराइल की तरह आत्मनिर्भर राष्ट्र
बन सकता है?
क्या भारत का आम युवा इजराइली युवा की तरह आत्मसम्मानी और उत्साही दिख सकता है ?
यदि हां तो कैसे कब तक ?
इन बातो को भारत के जल जंगल जमीन श्रम तथा पारिवारिक सामुदायिक तथा सामाजिक परिस्थिति मे दिखने वाली अशान्ति के बीच से खोजने होगा ।
असंतुलन हम कैसे कम करेगे यह सोचना होगा ?
innovation के लिए जो संकल्प शक्ति
भारत के गांवो मे थी
वह राजनैतिक लोगो ने ही तो मारी ।
गांव को 20 साल की सहभागी प्लानिंग करने का कोई अवसर नही तब  Innovation केवल सरकारी अधिकारी और जनप्रतिनिधि ही करते वह भी शासन की मंशा से ।
सरकार की जैसी मंशा /गाईड लाइन वैसा Innovation?
जितने विभाग है उतनी प्लानिंग है और इसके साथ यदि कोई स्वयंसेवी संगठन है तो उसकी अपनी प्लानिंग और बजट है ।
कही कोई समन्वय दूर दूर तक नही दिखता ?
बच्चो के सुनने वाले फोरम बच्चो से दूर है शिक्षक समाज मे विलुप्त है जो है वह अपने व्यक्तिगत विकास मे लगे है ?
भारत के शिक्षक राजनीतिक मे अधिक रहते है जैसे
÷ माननीय मुलायम सिंह
÷ माननीय मुरली मनोहरजोशी
स्कूल मे बच्चो का ठहराव और शिक्षक का ठहराव नही है।महाविद्यालय मे फर्जी वाडा है और विश्व विद्यालय मे जाति तथा कमीशन बाजी और फर्जी रिजल्ट बनाने मे सब परेशान है ?
जितने नेता /संत  है सबके पास महाविद्यालय /विश्व विद्यालय है पर इन्सान बनाने की कोई पाठशाला नही है ?
यह इजराइल के पास है ?
मै भारत के प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा को बहुत ही रचनात्मक मानता हू ।
मै भाई नरेंद्र मोदी की स्मरण शक्ति तथा तथ्यो के साथ कई विषय की मुख्य जानकारी का एक साथ प्रस्तुतीकरण करने की कला को विशेष रूप से तब मानता हू जब वह बेबाक बिना लिखित पेपर के धाराप्रवाह बोलते है।
उन्होने बहुत अच्छे तथ्यो के साथ भारत और इजराइल के बीच मूक सम्बन्धो के इतिहास को बखूबी तब प्रस्तुत किया जब इज़राइल के प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू  ने भारत के प्रधानमंत्री भाई नरेंद्र मोदी का स्वागत प्रोटोकॉल की सीमाओ को तोड़ कर तहे दिल से किया।
भाई मोदी जी ने बखूबी यह बताने की कोशिश की भारत की आध्यात्मिक शक्ति ने इजराइल को संरक्षित कैसे किया ?
उन्होंने बताया कि इजराइल का पवित्र पूजा स्थल यरूशलम कैसे तेजस्वी हुवा। भारत के महान सूफी संत बाबा फरीद 13 वी शताब्दी मे
यरूशलम  आए और यहां एक गुफा मे रह कर लम्बी साधना की।इस साधना का प्रभाव है कि यह जगह आज तीर्थ स्थल है।
अभिमन्यु भाई

संत व भू माफिया मिलकर ऋषि मुनियो की समाधियों को तोड़ने में हुए आमादा ....

संत समाज को लज्जित करने वाला एक बेहद ही  शर्मनाक मामला धर्म नगरी मे सामने आया है ।जहां एक विश्व प्रसिद्ध आश्रम के महंत द्वारा ट्रस्ट की जमीन को बेचने के लिए अपने गुरू जनो व पूर्वज संतो की समाधियों को ही बेचने में अमादा हो गया है और भूमाफिया  को संतों की समाधियों को तोड़ने का गुप्त ठेका दे दिया है आपको बता दें कि यह पूरा मामला चित्रकूट के पीली कोठी आश्रम के महंत दिव्यानंद द्वारा सतना चित्रकूट मार्ग में स्फटिक शिला के पास बेशकीमती जमीन को बेचने के लिए यह घिनौना खेल खेला गया है जिसमें भूमाफिया राजकिशोर शिवहरे ने महंत दिव्यानंद से ट्रस्ट की जमीन को खरीदने के लिए उस जमीन को कब्जे में लेकर उसको पूरी तरह से लेबल करवा दिया है हरे भरे पेड़ों को काटने का भी काम शुरू कर दिया है यह जमीन पीली कोठी आश्रम के लगभग 500 वर्ष से भी अधिक पुरानी है ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि यहां पर पीली कोठी आश्रम से जुड़े हुए महंतो की ग्यारह समाधियां बनी हुई है और यह जमीन संस्था की है इसलिए इस जमीन को भू माफिया द्वारा कब्जे में लेकर के इन समाधियों में से एक समाज को खंडित भी कर दिया गया है आपको बता दें कि चित्रकूट के आराजी संख्या 163/2 हल्का राजौला जो की पिली कोठी आश्रम ट्रस्ट के नाम उसे  संत दिव्यानंद अपने निजी हित व ऐशो आराम  के लिए इसको बेचने में तुला हुआ है और इस 22 बीघे बेशकीमती जमीन का 40 करोड़ रुपए में सौदा भी कर लिया है जिसको राजकिशोर शिवहरे जो कि पहले भी मध्यप्रदेश क्षेत्र की धर्म नगरी में कई जमीनों पर अवैध कब्जे को लेकर के सुर्खियों में रहा है और एक बार फिर इस संत की मिलीभगत से धर्मनगरी की शाख को कलंकित करने में आमादा  हो गया है गौरतलब है कि पीलीकोठी आश्रम की कई संस्थाएं हैं जिनमें मथुरा ,हरिद्वार जैसे कई तीर्थ स्थलों में भी अपनी आश्रम होने के कारण दिव्यानंद द्वारा चित्रकूट के आश्रमों की जमीन को एक-एक करके बेचने का काम शुरू कर दिया है और संस्था की जमीनों को बेच कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर अपने नाम पर प्रॉपर्टी खरीदने का काम भी करने लगा है वही स्थानीय राजस्व अमला बाबा के रसूख के आगे घुटने टेके हुए है वही सरकार के एक रसूक दार मंत्री का नाम भी सुर्ख़ियो में है जिसके कारण बेख़ौफ़ कार्य किया जा रहा है  ।।


अतुल मिश्रा(पंकज)
   चित्रकूट